लुई पाश्चर न होते तो हम दूध का पाश्चुरिकरण न जान पाते :- न्यायधीश कपिल देव




मैं प्रकृति को जितनी बार भी देखता हूं उतनी बार निर्माता की प्रशंसा करता हूं। प्रकृति की रचना ईश्वर की एक अद्भुत कलाकृति है। यह विचार गुरुवार को राजगढ़ जिले के कुरावर में स्थित होली एंजिल्स किड्स एकेडमी स्कूल में आयोजित साक्षरता शिविर में न्यायाधीश कपिल देव द्वारा व्यक्त किए गए। न्यायधीश कपिल देव द्वारा छात्रों को कानून की जानकारी के साथ-साथ अपने जीवन में कठिन परिश्रम कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के तरीके भी बताए गए। न्यायाधीश कपिल देव ने छात्रों को महान फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर की कहानी सुनाई । उन्होंने कहा कि लुई पाश्चर ना होते तो हम दूध कैसे पीते दूध के संबंध में पाश्चुरीकरण की प्रक्रिया लुइ पाश्चर की ही देन है। उन्होंने बताया कि 1822 में लुई पाश्चर का जन्म फ्रांस के गांव में हुआ था। गांव जंगल के नजदीक होने के कारण कुछ पागल भेड़िए उनके गांव में आ गए थे जिन्होंने 8 व्यक्तियों को काट लिया था । जिससे आठ व्यक्ति भेड़ियों की तरह व्यवहार करने लगे थे क्योंकि भेड़ियों के काटने से उनके शरीर में रेबीज कीटाणु फैल गए थे ।यह सब लुइ पाश्चर ने देखा था और अपने पिता से पूछा था कि इसका कोई इलाज नहीं है। तब उनके पिता ने कहा था कि इसका कोई इलाज नहीं है यदि तुम चाहो तो बड़े होकर इसका इलाज कर सकते हो ।बस फिर क्या था लुई पाश्चर ने विषम परिस्थितियों में  भी अपना अध्ययन जारी रखा और उन्होंने अपने गहन शोध के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि हमारे खाने पीने की प्रत्येक वस्तु में छोटे-छोटे कीटाणु होते हैं जिन्हें जीवाणु का नाम पहली बार लुइ पाश्चर नहीं दिया ।उन्होंने दूध को 60 डिग्री सेंटीग्रेड पर गर्म किया तो फिर वह दूध कुछ समय तक खराब नहीं हुआ। लुई पाश्चर की इस खोज के कारण ही हम दूध के गर्म करने की प्रक्रिया को पाश्चुरीकरण कहते हैं ।छोटे-छोटे जीवाणु खाद्य पदार्थ में होते हैं तो वह लोगों के रक्त में भी हो सकते हैं और इस प्रकार वह बीमारी पैदा कर सकते हैं यही ध्यान में रख कर ली पाश्चर ने अपनी खोज जारी रखी । उन दिनों फ्रांस में मुर्गियों में एक वायरस के कारण भयंकर महामारी फैली हुई थी, लाखों मुर्गियां मर चुकी थी लुई पाश्चर ने मरी हुई मुर्गियों से उन जीवाणु को निकाला और उन्हें निष्क्रिय कर इंजेक्शन के माध्यम से स्वस्थ मुर्गियों की देह में पहुंचाया ।इससे वैक्सीन लगी हुई मुर्गियों को कभी भी वह महामारी नहीं हुई ।लुई पाश्चर का यह प्रयोग जानवरों पर तो सफल हो चुका था। लेकिन इंसानों पर इसका प्रयोग किया जाना बाकी था ।सन 1885 में एक दिन लुइ पाश्चर अपनी प्रयोगशाला में बैठे हुए थे। एक फ्रांसीसी महिला अपने 9 वर्षीय पुत्र को लेकर उनके पास पहुंची और कहा कि उसके पुत्र को पागल कुत्ते ने काट दिया है तब लुइ पाश्चर ने उस पागल कुत्ते की लार में से वह जीवाणु निकाला, लेकिन उनके सामने एक भयावह प्रश्न था कि यदि वह प्रयोग उस बच्चे पर करें तो उसके साथ कुछ अनहोनी भी हो सकती थी लेकिन यदि नहीं करें तब भी उसकी जान बच पाना बहुत मुश्किल था ।इसके बाद लुई पाश्चर ने यह निर्णय लिया और बालक का उपचार करना शुरू कर दिया और वही निष्क्रिय वायरस  बच्चे को इंजेक्ट करते गए जिससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस वायरस से लड़ना सीख गई और वह धीरे-धीरे स्वस्थ हो गया । मानव जाति के इतिहास में यह एक बड़ा अविष्कार था । इस महान व्यक्तित्व के सम्मान में फ्रांसीसी सरकार ने पाश्चर इंस्टिट्यूट का निर्माण किया और बहुत सम्मानों से उन्हें सम्मानित किया गया। न्यायाधीश कपिल देव ने कहा कि लुइ पाश्चर जैसा महान वैज्ञानिक भारत का प्रत्येक बच्चा बन सकता है और देश का नाम रोशन कर सकता है। बच्चे हमारे देश की आधारशिला हैं उन्हें मार्गदर्शन और सही रास्ता दिखाने का समय है । विधिक साक्षरता शिविर में विद्यालय के समस्त छात्र सहित प्रिंसिपल जस्टिन जोसेफ सर और कुरावर थाने से सहायक उपनिरीक्षक लांबा जी उपस्थित रहे।

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